उसके पेट में दर्द सा था,
पता किया चिंगारी थी।
कहा सब ने बुझा डालो,
पर उसने कुछ ठानी थी।
एक कहानी उसने जी थी
और उसने एक सोची थी।
हवा दि हल्की चिंगारी को
धुएं से आँखें नम हुई।
तुफान आया उसे हिलाने,
रही वो तब भी द्रण खड़ी।
बाढ़ आई सब कुछ बह गया,
चिंगारी अब भी जल रही।
की तपस्या नौ महीने,
और दर्द का चुनाव किया।
पैदा किया आग को,
पाल पोस कर लौ बनाई।
जिसने रोका वो जला और
वो गर्व से बेटी की माँ कहलाई। .

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